बुधवार, २३ एप्रिल, २००८

कागज़ के फ़ुल ..

कागज़ के फ़ुल ..
कागज़ के फ़ुल आज़कल मेहेंगे हो गये है
असली फ़ुल तो फ़िर भी मुस्कुराते है
पर उस मुस्कान के पिछे
कुछ दर्दसा छुपा है जैसे
कागज़ के फ़ुल आज़कल मेहेंगे हो गये है..

सब अपने हिसाबसे जिते है इधर
हसते है बोलते है कभी चुप से होते है
अपनेही मर्जी के मालीक..
असली फ़ुल मुरझा जाते है
फ़िर बदलने पडते है
कागज़ के फुलो का अच्छा है
मुरझाते भी नही
दिखते भी सुंदर है
रही बात खुषबु की..
उतना तो एगजेस्ट होता है भाई
वैसे तो आज कल खुशबु भी
बाजारो में मिलती है
कागज़ के फ़ुल आज़कल मेहेंगे हो गये है
कागज़ के फ़ुल ॥

...स्नेहा

५ टिप्पण्या:

सुनिल सावंत म्हणाले...

hmmmm.....!!! pan shevati kharya fulachi sar kaagadi fulala yet nahi baiee...

sunil

Monsieur K म्हणाले...

can artificial ever replace the natural?

.... म्हणाले...

koni kharya fulachi jaga nahi gheu shakat malahi mahit aahe...
pan he rupak aahe ... kavitech

अनामित म्हणाले...
ब्लॉग प्रशासकाने ही टिप्पण्णी हटविली आहे.
prawin म्हणाले...
ही टिप्पणी लेखकाना हलविली आहे.